उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kya na dekha ye kaho ye na kaho kya dekha

क्या न देखा ये कहो ये न कहो क्या देखा

کیا نہ دیکھا یہ کہو یہ نہ کہو کیا دیکھا

शायर: Zaheen Shah Taji8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

क्या न देखा ये कहो ये न कहो क्या देखा
हम ने जो कुछ भी किसी बज़्म में देखा देखा

देखने को सर-ए-महफ़िल रुख़-ए-ज़ेबा देखा
हम को जो कुछ तिरी आँखों ने दिखाया देखा

वो बहारें कि तिरे साथ मुझे देख गईं
क्या कहेंगी अगर आ कर मुझे तन्हा देखा

हुस्न-ए-ख़ुद-बीं को है क्या ‘इश्क़-ए-ख़ुदा-बीं से गुरेज़
मेरी आँखों से भी अपना रुख़-ए-ज़ेबा देखा

सब से मिल कर भी कम-आमेज़ है तम्कीन-ए-जमाल
तुझ को देखा तो भरी बज़्म में तन्हा देखा

नुक्ता-चीं दीदा-ए-ज़ाहिर है मिरी आँखों पर
हम ने आईना न देखा रुख़-ए-ज़ेबा देखा

चाँदनी चाँद सी सूरत की घनी ज़ुल्फ़ की छाँव
फिर अंधेरा नज़र आया न उजाला देखा

उस को अपना कोई समझा है न समझेगा 'ज़हीन'
जिस को बेगानगी-ए-होश में अपना देखा