उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kya kahen kya husn ka aalam raha

क्या कहें क्या हुस्न का आलम रहा

کیا کہیں کیا حسن کا عالم رہا

शायर: Baqa Baluch6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

क्या कहें क्या हुस्न का आलम रहा
वो रहे और आइना मद्धम रहा

ज़िंदगी से ज़िंदगी रूठी रही
आदमी से आदमी बरहम रहा

रह गई हैं अब वहाँ परछाइयाँ
इक ज़माने में जहाँ आदम रहा

पास रह कर भी रहे हम दूर दूर
इस तरह उस का मिरा संगम रहा

तू मिरे अफ़्कार में हर पल रही
मैं तिरे एहसास में हर दम रहा

जी रहे थे हम तो दुनिया थी ख़फ़ा
मर गए तो देर तक मातम रहा