उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jaane kya soch ke ghar tak pahuncha

जाने क्या सोच के घर तक पहुँचा

جانے کیا سوچ کے گھر تک پہنچا

शायर: Baqa Baluch8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जाने क्या सोच के घर तक पहुँचा
मैं कि मेराज-ए-हुनर तक पहुँचा

अपने कश्कोल में हसरत ले कर
इक गदागर तिरे दर तक पहुँचा

दर्द उट्ठा था मिरे पहलू में
आख़िर-ए-कार जिगर तक पहुँचा

इक तबाही मिरे दिल पर उतरी
इक तमाशा मिरे घर तक पहुँचा

इक दुआ मेरे लबों तक आई
इक असर उस की नज़र तक पहुँचा

जितनी आहें मिरे दिल से निकलें
या ख़ुदा उन को असर तक पहुँचा

शाख़ से टूटा हुआ पत्ता हूँ
तू मुझे मेरे शजर तक पहुँचा

हम सितारों की ख़बर लाएँगे
ये ख़बर अहल-ए-ख़बर तक पहुँचा