उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kaisa lamha aan paDa hai

कैसा लम्हा आन पड़ा है

کیسا لمحہ آن پڑا ہے

शायर: Baqa Baluch5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कैसा लम्हा आन पड़ा है
हँसता घर वीरान पड़ा है

बिस्तर पर कुछ फूल पड़े हैं
आँगन में गुल-दान पड़ा है

किरची किरची सपने सारे
दिल में इक अरमान पड़ा है

लोग चले हैं सहराओं को
और नगर सुनसान पड़ा है

इक जानिब इक नज़्म के टुकड़े
इक जानिब उनवान पड़ा है