उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kya hua rangini-e-subh-o-masa baqi nahin

क्या हुआ रंगीनी-ए-सुब्ह-ओ-मसा बाक़ी नहीं

کیا ہوا رنگینیٔ صبح و مسا باقی نہیں

शायर: Habab Hashmi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

क्या हुआ रंगीनी-ए-सुब्ह-ओ-मसा बाक़ी नहीं
अपने ही घर में वो पहली सी फ़ज़ा बाक़ी नहीं

आरज़ुओं का कोई भी सिलसिला बाक़ी नहीं
मसअला ये है कि कोई मसअला बाक़ी नहीं

आ गया है अब सवा नेज़े पे देखो आफ़्ताब
अपना साया भी ज़मीं पर ज़ेर-ए-पा बाक़ी नहीं

मंज़िलें आवाज़ देती हैं कि हम हैं मुंतज़िर
क़ाफ़िले वालों में लेकिन हौसले बाक़ी नहीं

बे-महाबा उस के आने का नतीजा ये हुआ
आइना-ख़ाने में कोई आइना बाक़ी नहीं

कितनी मश्शाक़ी से उस ने साफ़ दो टुकड़े किए
जिस्म में अब एक भी तस्मा लगा बाक़ी नहीं

हम तो छोड़ आए थे गहरे नक़्श राहों में 'हबाब'
वाए-हसरत एक भी अब नक़्श-ए-पा बाक़ी नहीं