उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kya doge dawa tumko pata kuchh bhi nahin hai

क्या दोगे दवा तुम को पता कुछ भी नहीं है

کیا دوگے دوا تم کو پتہ کچھ بھی نہیں ہے

शायर: Faisal Qadri Gunnauri9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

क्या दोगे दवा तुम को पता कुछ भी नहीं है
बीमार-ए-मोहब्बत की दवा कुछ भी नहीं है

दीवाना-ए-उलफ़त पे बचा कुछ भी नहीं है
इस दिल में तिरे ग़म के सिवा कुछ भी नहीं है

इज़हार के आसार 'अयाँ हो गए रुख़ से
मैं ने तो अभी लब से कहा कुछ भी नहीं है

नादान थे उस शख़्स से की हम ने मोहब्बत
जिस शख़्स की नज़रों में वफ़ा कुछ भी नहीं है

दीदार की हसरत में गुज़र जाए न जाँ से
बीमार को आराम ज़रा कुछ भी नहीं है

ये नज़्म-ए-जहाँ कौन चलाता है बताएँ
जो लोग ये कहते हैं ख़ुदा कुछ भी नहीं है

ऐ हुस्न के पैकर मिरे महबूब के आगे
ये नाज़ ये शोख़ी ये अदा कुछ भी नहीं है

मुजरिम है खुले-आम ये इंसाफ़ तो देखो
है उस को सज़ा जिस की ख़ता कुछ भी नहीं है

'फ़ैसल' रह-ए-उल्फ़त में गँवाया है सभी कुछ
बस दर्द ही पाए हैं मिला कुछ भी नहीं है