उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kunj-e-hairat se chale dasht-e-ziyan tak lae

कुंज-ए-हैरत से चले दश्त-ए-ज़ियाँ तक लाए

کنج حیرت سے چلے دشت زیاں تک لائے

शायर: Badr Muneer7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कुंज-ए-हैरत से चले दश्त-ए-ज़ियाँ तक लाए
कौन ला सकता है हम दिल को जहाँ तक लाए

एक हंगामा बपा है पस-ए-दीवार-ए-बदन
है किसे ताब-ए-सुख़न कौन ज़बाँ तक लाए

ठीक है चश्म-ए-तग़ाफ़ुल ये तिरी देन सही
ताब ज़ख़्मों की मगर कोई कहाँ तक लाए

आँख वीराँ थी किसी दश्त-ए-तपाँ की सूरत
हम इसे सिलसिला-ए-आब-ए-रवाँ तक लाए

चल निकलती है तो फिर लब पे भी आ जाती है
लाने वाले की ये मर्ज़ी है जहाँ तक लाए

'ऐन-मुमकिन है ठहर जाए सज़ा-वार-ए-करम
हम यही सोच के दिल कू-ए-बुताँ तक लाए

तुझ को जो चाहिए बे-ख़ौफ़-ओ-ख़तर लेता जा
कौन काफ़िर है कि जो दिल में गुमाँ तक लाए