उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kuchh to hawa bhi sard thi kuchh tha tera KHayal bhi

कुछ तो हवा भी सर्द थी कुछ था तिरा ख़याल भी

کچھ تو ہوا بھی سرد تھی کچھ تھا ترا خیال بھی

शायर: Parveen Shakir10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कुछ तो हवा भी सर्द थी कुछ था तिरा ख़याल भी
दिल को ख़ुशी के साथ साथ होता रहा मलाल भी

बात वो आधी रात की रात वो पूरे चाँद की
चाँद भी 'ऐन चैत का उस पे तिरा जमाल भी

सब से नज़र बचा के वो मुझ को कुछ ऐसे देखता
एक दफ़'अ तो रुक गई गर्दिश-ए-माह-ओ-साल भी

दिल तो चमक सकेगा क्या फिर भी तरश के देख लें
शीशा-गिरान-ए-शहर के हाथ का ये कमाल भी

उस को न पा सके थे जब दिल का 'अजीब हाल था
अब जो पलट के देखिए बात थी कुछ मुहाल भी

मेरी तलब था एक शख़्स वो जो नहीं मिला तो फिर
हाथ दु'आ से यूँ गिरा भूल गया सवाल भी

उस की सुख़न-तराज़ियाँ मेरे लिए भी ढाल थीं
उस की हँसी में छुप गया अपने ग़मों का हाल भी

गाह क़रीब-ए-शाह-रग गाह बईद-ए-वहम-ओ-ख़्वाब
उस की रफ़ाक़तों में रात हिज्र भी था विसाल भी

उस के ही बाज़ुओं में और उस को ही सोचते रहे
जिस्म की ख़्वाहिशों पे थे रूह के और जाल भी

शाम की ना-समझ हवा पूछ रही है इक पता
मौज-ए-हवा-ए-कू-ए-यार कुछ तो मिरा ख़याल भी