उर्दू शायरी · ग़ज़ल

koi zarra jo dil ki KHak ka barbaad hota hai

कोई ज़र्रा जो दिल की ख़ाक का बर्बाद होता है

کوئی ذرہ جو دل کی خاک کا برباد ہوتا ہے

शायर: Vahshi Kanpuri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कोई ज़र्रा जो दिल की ख़ाक का बर्बाद होता है
जहान-ए-इश्क़ में शोर-ए-मुबारकबाद होता है

न पूछो क्या सुरूर-ए-लज़्ज़त-ए-बेदाद होता है
जब आग़ोश-ए-मोहब्बत में दिल-ए-नाशाद होता है

ख़ुदा जाने ये क्या दाम-ए-बला है गुलशन-ए-हस्ती
जिधर परवाज़ करता हूँ उधर सय्याद होता है

ये दर्स-ए-इश्क़ भी कैसा अनोखा दरस है या-रब
कि जितना भूलता जाता हूँ उतना याद होता है

जो तेरी याद में गिरता है बन कर गौहर-ए-मक़्सद
वही अश्क-ए-मोहब्बत हासिल-ए-रूदाद होता है

कोई शोरीदा-सर पाबंद-ए-ज़िंदाँ हो नहीं सकता
बगूला अपनी ज़ंजीरों में भी आज़ाद होता है

जो 'वहशी' की तरह होता है पाबंद-ए-ग़म-ए-जानाँ
वही तो बस ग़म-ए-दौराँ से भी आज़ाद होता है