उर्दू शायरी · ग़ज़ल

koi darwaze pe baiTha nahin dekha jata

कोई दरवाज़े पे बैठा नहीं देखा जाता

کوئی دروازے پہ بیٹھا نہیں دیکھا جاتا

शायर: Fahmi Badayuni7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कोई दरवाज़े पे बैठा नहीं देखा जाता
क्या तिरे शह्र में रस्ता नहीं देखा जाता

ऊब जाते हैं तमाशे से तमाशाई सब
फिर भी गिरता हुआ पर्दा नहीं देखा जाता

याद आ जाता है आकाश से रिश्ता अपना
घर का टूटा हुआ ज़ीना नहीं देखा जाता

दस्तकें देने को ये हाथ तड़प उठते हैं
उस के दरवाज़े पे ताला नहीं देखा जाता

वो सफ़र सिर्फ़ जनाज़े का सफ़र होता है
जिस में अपना या पराया नहीं देखा जाता

आँख हर शख़्स को तस्वीर का इमला बोले
एक ही शख़्स को इतना नहीं देखा जाता

जो भी दिल में है वो काग़ज़ पे बना दो यारो
आज के दौर में चेहरा नहीं देखा जाता