उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kisi manzil pe bhi zulm-o-sitam se Dar nahin sakta

किसी मंज़िल पे भी ज़ुल्म-ओ-सितम से डर नहीं सकता

کسی منزل پہ بھی ظلم و ستم سے ڈر نہیں سکتا

शायर: Om Prakash Laghar6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

किसी मंज़िल पे भी ज़ुल्म-ओ-सितम से डर नहीं सकता
कि मैं सज्दा कभी बातिल के आगे कर नहीं सकता

ये माना लफ़्ज़ में इज़हार की क़ुव्वत तो होती है
मगर हक्क़-ओ-हक़ीक़त को बयाँ ये कर नहीं सकता

उसे अख़्लाक़ और तहज़ीब का क्यों दर्स देते हो
शिकम जो आदमी नान-ए-जवीं से भर नहीं सकता

असीर-ए-आरज़ू रहता है जो इंसान दुनिया में
सुकून-ए-दिल किसी सूरत वो हासिल कर नहीं सकता

फ़िदा जो मग़रिबी तहज़ीब पर हैं जान जाएँगे
दिया मग़रिब का मशरिक़ को मुनव्वर कर नहीं सकता

भरोसा दिल से है 'लाग़र' जिसे उस की इनायत पर
वो इंसाँ अह्ल-ए-दुनिया पर भरोसा कर नहीं सकता