उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kisi ki yaad mein likkha hai jo kuchh

किसी की याद में लिक्खा है जो कुछ

کسی کی یاد میں لکھا ہے جو کچھ

शायर: Hafeez Shahid13 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

किसी की याद में लिक्खा है जो कुछ
यही कुछ है मिरा अपना है जो कुछ

उसी का अक्स है लफ़्ज़ों में मेरे
नज़र के सामने दुनिया है जो कुछ

ज़रूरत-मंद हूँ मुझ को अता कर
सखी दाता मिरा हिस्सा है जो कुछ

चुरा ले जाएगी बाद-ए-सबा भी
छुपा कर फूल ने रक्खा है जो कुछ

मुक़द्दर है इसी का नाम शायद
मुझे वो बे-तलब देता है जो कुछ

बता देंगी हवाएँ हर किसी को
लब-ए-अश्जार पर क़िस्सा है जो कुछ

मह-ओ-ख़ुर्शीद तो कुछ भी नहीं हैं
मिरी मिट्टी का इक ज़र्रा है जो कुछ

किसी दिन वो भी ले जाएगा कोई
सर-ए-बाज़ार-ए-जाँ सौदा है जो कुछ

कहाँ तक मैं तजस्सुस में रहूँगा
उठा दो दरमियाँ पर्दा है जो कुछ

नहीं सूझा जो अब उस का अभी तक
किसी की आँख ने पूछा है जो कुछ

नहीं कुछ और पाने की तमन्ना
ग़नीमत है यहाँ पाया है जो कुछ

उसे तहरीर करता जा रहा हूँ
मिरी सोचों का अफ़्साना है जो कुछ

भँवर हों या ख़स-ओ-ख़ाशाक 'शाहिद'
हमारा है सर-ए-दरिया है जो कुछ