उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kisi ke hijr ke sae mein aa khaDa hun main

किसी के हिज्र के साए में आ खड़ा हूँ मैं

کسی کے ہجر کے سائے میں آ کھڑا ہوں میں

शायर: Aamir Ata6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

किसी के हिज्र के साए में आ खड़ा हूँ मैं
'अजीब दुख है मिरा छाँव में जला हूँ मैं

अभी तो साँस है बाक़ी ज़रा बचा हूँ मैं
वो कब तलक नहीं आएगा देखता हूँ मैं

मैं सर पे गठरी ग़मों की उठाए फिरता हूँ
अब अहल-ए-'इल्म कहेंगे कि सर-फिरा हूँ मैं

बस इस लिए कि तिरा हौसला न माँद पड़े
बस इस लिए ही तो कहता हूँ अब नया हूँ मैं

बस इस लिए कि मुझे कह के सोचना न पड़े
हमेशा सोच-समझ कर ही बोलता हूँ मैं

अब इस से क़ब्ल त'आरुफ़ मैं अपना पेश करूँ
हरीफ़ पहले बता देते हैं 'अता' हूँ मैं