उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kisi ka KHair kya kahun ki dhyan tak nahin raha

किसी का ख़ैर क्या कहूँ कि ध्यान तक नहीं रहा

کسی کا خیر کیا کہوں کہ دھیان تک نہیں رہا

शायर: Qamar Abbas Qamar6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

किसी का ख़ैर क्या कहूँ कि ध्यान तक नहीं रहा
मैं अपने आप पर भी मेहरबान तक नहीं रहा

उस एक लब के मो'जिज़े में क्या गिनाउँगा तुझे
ये देख मेरे ज़ख़्म का निशान तक नहीं रहा

तमाम शहर जिस से मिलना चाहता था उन दिनों
मैं उस से यूँ मिला कि उस को जान तक नहीं रहा

ज़रा सी बात पर ख़फ़ा हुआ था और क्या कहूँ
सो हाथ जोड़ने पे भी वो मान तक नहीं रहा

तुम्हारा हिज्र एक रात पाँव से लिपट गया
मैं अपने घर में सुब्ह की अज़ान तक नहीं रहा

पड़े पड़े यहीं पे ढेर हो न जाए ये बदन
मैं ख़ाक अपनी रास्तों पे छान तक नहीं रहा