उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kisi ka hath daman par kisi ka sar gareban mein

किसी का हाथ दामन पर किसी का सर गरेबाँ में

کسی کا ہاتھ دامن پر کسی کا سر گریباں میں

शायर: Qaisar Haideri Dehlvi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

किसी का हाथ दामन पर किसी का सर गरेबाँ में
ये दीवाने भी गुल-छर्रे उड़ाते हैं बयाबाँ में

समा कर रह गया हर उन का जल्वा क़ल्ब-ए-सोज़ाँ में
कहाँ से इतनी वुसअ'त आ गई इस तंग-दामाँ में

सलीक़ा ख़ाक उड़ाने का बड़ी मुश्किल से आता है
बगूले सर पटक कर रह गए आख़िर बयाबाँ में

हँसी कलियों के लब पर है क़बा-ए-गुल के टुकड़े हैं
सभी पर छा गई दीवानगी अब के गुलिस्ताँ में

क़रीब आया ज़माना जब भी अहद-ए-गुल की रुख़्सत का
उलझ कर रह गया दस्त-ए-जुनूँ तार-ए-गरेबाँ में

सुवैदा बुत-कदा है दिल हरम नज़रें पुजारी हैं
यहाँ तफ़रीक़ भी कुछ है तो ये है कुफ़्र-ओ-ईमाँ में

इक़ामत के लिए क्या वुसअ'त-ए-कौनैन कुछ कम थी
अबस अंगड़ाई ली तुम ने दिल-ए-नज़्ज़ारा-सामाँ में

जो आँखों से लगाए गुल तो काँटे रख लिए दिल में
मुझे दोनों ही से 'क़ैसर' इलाक़ा था गुलिस्ताँ में