उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kise bataen ki zad-e-safar gaya kab ka

किसे बताएँ कि ज़ाद-ए-सफ़र गया कब का

کسے بتائیں کہ زاد سفر گیا کب کا

शायर: Habab Hashmi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

किसे बताएँ कि ज़ाद-ए-सफ़र गया कब का
रहा ही क्या है ग़म-ए-मो'तबर गया कब का

मुझे भी देख कि मैं एक नक़्श-ए-हैरत हूँ
दिखा के आइना आईना-गर गया कब का

तलाश सहरा-ब-सहरा जिसे किया मैं ने
वो मेरी रूह के अंदर उतर गया कब का

दुआ रहीन-ए-असर है ये बात सच है मगर
मिरी दुआ से यक़ीनन असर गया कब का

न संग-ए-मील न जादा न कोई मंज़िल-ए-शौक़
अकेला मैं हूँ मिरा हम-सफ़र गया कब का

कोई उमीद न ख़्वाहिश न आरज़ू बाक़ी
कि मेरे जिस्म का इंसान मर गया कब का

'हबाब' एक तनावर दरख़्त था मैं भी
प टूट टूट के आख़िर बिखर गया कब का