उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kis liye dasht mein ghar koi banaya jae

किस लिए दश्त में घर कोई बनाया जाए

کس لیے دشت میں گھر کوئی بنایا جائے

शायर: Badiuzzaman Khawar11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

किस लिए दश्त में घर कोई बनाया जाए
पास क्या है जो फ़सीलों में छुपाया जाए

मैं जज़ीरा हूँ मिरी प्यास बुझाने के लिए
इक समंदर मिरे अतराफ़ बिछाया जाए

किसी सहरा में बहा जाए नदी की सूरत
अब्र बन कर किसी कोहसार पे छाया जाए

रोज़ चटके किसी उम्मीद का ग़ुंचा दिल में
रोज़ पलकों पे कोई ख़्वाब सजाया जाए

दुख से जलते हुए इस दौर में जीने से बड़ा
मो'जिज़ा कौनसा दुनिया को दिखाया जाए

बात क्या है कि ब-ईं-ख़्वारी-ओ-आशुफ़्ता-दिली
छोड़ कर हम से तिरा शहर न जाया जाए

रौशनी हूँ तो कहा जाए चराग़-ए-मंज़िल
संग हूँ तो मुझे रस्ते से हटाया जाए

पूछते रहते हैं ये लोग न जाने क्या क्या
हम से तो नाम भी अपना न बताया जाए

रह गई है यही इक हम-सफ़री की सूरत
बोझ हो ख़्वाह किसी का भी उठाया जाए

हाए ये धूप मचाता हुआ सावन जिस से
किसी चट्टान पे सब्ज़ा न उगाया जाए

आज मर जाऊँ अगर मैं तो 'अजब क्या 'ख़ावर'
सौ बरस बा'द मिरा सोग मनाया जाए