उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kis ki KHwahish mein jal raha hai badan

किस की ख़्वाहिश में जल रहा है बदन

کس کی خواہش میں جل رہا ہے بدن

शायर: Qamar Saqi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

किस की ख़्वाहिश में जल रहा है बदन
मोम जैसा पिघल रहा है बदन

धीरे धीरे बदल रहे हैं ख़याल
रफ़्ता रफ़्ता बदल रहा है बदन

दुख के काँटों पे सो रहा हूँ मैं
ग़म के शो'लों पे जल रहा है बदन

हुस्न-ए-पुर-नूर से लिपटने को
पागलों सा मचल रहा है बदन

सेज पे खिल रहे हैं वस्ल के फूल
रात पे इत्र मल रहा है बदन

सुब्ह होने को है 'क़मर' साहब
इक बदन से निकल रहा है बदन