उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ek dabe aks ko ukera jae

इक दबे 'अक्स को उकेरा जाए

اک دبے عکس کو اکیرا جائے

शायर: Qamar Saqi4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इक दबे 'अक्स को उकेरा जाए
उस के काँधे पे हाथ फेरा जाए

तोड़ कर अब शनावरी के उसूल
रात भर बिस्तरों पे तैरा जाए

चंद जिस्मों को धूप में रख कर
आज परछाइयों को घेरा जाए

अब मिरी दौड़ने की ख़्वाहिश है
फ़र्श पे आग को बिखेरा जाए