उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHwab palkon pe meri aa ke machal jate hain

ख़्वाब पलकों पे मिरी आ के मचल जाते हैं

خواب پلکوں پہ مری آ کے مچل جاتے ہیں

शायर: Yasmin Husaini Zaidi Nikhat6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़्वाब पलकों पे मिरी आ के मचल जाते हैं
या कभी बन के गुहर आँख से ढल जाते हैं

मुझ को गोशा कोई मानूस सा जो लगता है
लोग दीवार पे तस्वीर बदल जाते हैं

कल वो 'आलम था कि इक जान थी दो क़ालिब थे
आज ये है कि वो कतरा के निकल जाते हैं

हम को तूफ़ान-ए-हवादिस का कोई ख़ौफ़ नहीं
ये जो आते हैं तो कुछ हम भी बहल जाते हैं

अपने आँगन में वो सूरज के तमन्नाई हैं
जो दिया देख के हमसाए का जल जाते हैं

मैं सुख़नवर भी नहीं फ़न का सलीक़ा भी नहीं
ज़ख़्म हैं दिल के जो नग़्मात में ढल जाते हैं