उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kaise har dard ko sine mein chhupae rakkhen

कैसे हर दर्द को सीने में छुपाए रक्खें

کیسے ہر درد کو سینے میں چھپائے رکھیں

शायर: Yasmin Husaini Zaidi Nikhat7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कैसे हर दर्द को सीने में छुपाए रक्खें
और होंटों पे तबस्सुम को सजाए रक्खें

जो थे अपने वो ज़माना हुआ सब छोड़ गए
कब तलक बज़्म को ग़ैरों से सजाए रक्खें

ये सुना है कि वहाँ देर है अंधेर नहीं
तो चलो बहर-ए-दुआ हाथ उठाए रक्खें

जब ये छट जाएँगे बादल तो किरन फूटेगी
शम' उम्मीद की इक हम भी जलाए रक्खें

यूँ तो भूले से भी अब याँ न कोई आएगा
एहतियातन ही मगर घर को सजाए रक्खें

दिल में सोई हुई चिंगारी ने करवट ली है
अब तो इस आग से दामन को बचाए रक्खें

होगा 'निकहत' से मो'अत्तर ये चमन भी इक रोज़
बस तिरी याद के पौदों को लगाए रक्खें