उर्दू शायरी · ग़ज़ल

apni hasti mein simaTti ja rahi hun

अपनी हस्ती में सिमटती जा रही हूँ

اپنی ہستی میں سمٹتی جا رہی ہوں

शायर: Yasmin Husaini Zaidi Nikhat4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अपनी हस्ती में सिमटती जा रही हूँ
सारी दुनिया से मैं कटती जा रही हूँ

रेत पर लिक्खे हुए इक नाम जैसी
मैं हवा के साथ मिटती जा रही हूँ

देख कर फ़ौज-ए-रक़ीबाँ गामज़न में
रास्ते से ख़ुद ही हटती जा रही हूँ

ज़ीस्त का थी मैं मुकम्मल इक फ़साना
किस लिए क़िस्तों में बटती जा रही हूँ