उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHwab ki tarah bikhar jaane ko ji chahta hai

ख़्वाब की तरह बिखर जाने को जी चाहता है

خواب کی طرح بکھر جانے کو جی چاہتا ہے

शायर: Iftikhar Arif5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़्वाब की तरह बिखर जाने को जी चाहता है
ऐसी तन्हाई कि मर जाने को जी चाहता है

घर की वहशत से लरज़ता हूँ मगर जाने क्यूँ
शाम होती है तो घर जाने को जी चाहता है

डूब जाऊँ तो कोई मौज निशाँ तक न बताए
ऐसी नद्दी में उतर जाने को जी चाहता है

कभी मिल जाए तो रस्ते की थकन जाग पड़े
ऐसी मंज़िल से गुज़र जाने को जी चाहता है

वही पैमाँ जो कभी जी को ख़ुश आया था बहुत
उसी पैमाँ से मुकर जाने को जी चाहता है