उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHuda ko KHud pe jo ghaalib samajh nahin sakta

ख़ुदा को ख़ुद पे जो ग़ालिब समझ नहीं सकता

خدا کو خود پہ جو غالب سمجھ نہیں سکتا

शायर: Zaheen Shah Taji7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़ुदा को ख़ुद पे जो ग़ालिब समझ नहीं सकता
वो ‘इल्म-ए-हक़ के मतालिब समझ नहीं सकता

वो है सनम-कदा-ए-मुम्किनात में आज़र
जो राज़-ए-हस्ती-ए-वाजिब समझ नहीं सकता

जो वहम-ए-ग़ैर में है अपने आप से महजूब
है ख़ुद हिजाब कि हाजिब समझ नहीं सकता

समझ रहा है जो ‘अक़्ल-ए-शिकस्ता-पा को ख़िज़्र
जुनूँ के जाह-ओ-मनासिब समझ नहीं सकता

कलाम-ए-हक़ की सिफ़त है 'ज़हीन' मेरा कलाम
न हो ख़ुदा का जो तालिब समझ नहीं सकता

ख़ुदा है फ़ह्म से बाला समझ नहीं सकता
समझ रहा है जो समझा समझ नहीं सकता

गुज़र 'ज़हीन' के दिल में नहीं हुआ जिस का
ख़ुदा के दिल की तमन्ना समझ नहीं सकता