उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHud-parasti ka nasha mujhko chaDha hai aaj-kal

ख़ुद-परस्ती का नशा मुझ को चढ़ा है आज-कल

خود پرستی کا نشہ مجھ کو چڑھا ہے آج کل

शायर: Uroosa Jilani6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़ुद-परस्ती का नशा मुझ को चढ़ा है आज-कल
शौक़ तुझ सा होने का मुझ को हुआ है आज-कल

कल तलक था जो वफ़ा की सल्तनत का पेशवा
शोर उस की बेवफ़ाई का बपा है आज-कल

बाग़बाँ तू कुछ सवालों की इजाज़त दे मुझे
किस की ग़फ़लत से चमन उजड़ा पड़ा है आज-कल

दब गई है रू-ब-रू क़ाज़ी की चीख़ों की सदा
रहज़नों को मुंसिफ़ों का आसरा है आज-कल

अक्स तेरा एक पल भी आँख से ओझल न हो
देख मेरे इश्क़ की ये इंतिहा है आज-कल

घर बना लो तुम 'उरूसा' और किसी दुनिया में अब
दहर में जीने का मतलब हादिसा है आज-कल