उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHud hi ye dard-e-sar qubul kiya

ख़ुद ही ये दर्द-ए-सर क़ुबूल किया

خود ہی یہ درد سر قبول کیا

शायर: Om Krishn Rahat8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़ुद ही ये दर्द-ए-सर क़ुबूल किया
हर अज़ाब-ए-सफ़र क़ुबूल किया

कौन है जिस की खोज में हम ने
घूमना दर-ब-दर क़ुबूल किया

न तो मैं ही कहूँ न दिल मेरा
किस ने किस का असर क़ुबूल किया

घूमना कूचा-ए-मलामत में
हम ने क्या सोच कर क़ुबूल किया

हम ने दो दिन की ज़िंदगी के लिए
कितना लम्बा सफ़र क़ुबूल किया

मा'नी-ए-ज़ीस्त ही बदल देंगे
हम ने जीना अगर क़ुबूल किया

दीद की चाह में इन आँखों ने
हर फ़रेब-ए-नज़र क़ुबूल किया

इस इबादत के फ़र्ज़ को 'राहत'
मन नहीं था मगर क़ुबूल किया