उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHud arsh-e-barin ko bhi jhukte hue paya hai

ख़ुद अर्श-ए-बरीं को भी झुकते हुए पाया है

خود عرش بریں کو بھی جھکتے ہوئے پایا ہے

शायर: Om Prakash Laghar6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़ुद अर्श-ए-बरीं को भी झुकते हुए पाया है
सर जब भी कभी हम ने सज्दे में झुकाया है

दुनिया के इरादों को ये भाँप गया होगा
पज़मुर्दा सा जो चेहरा सूरज ने बनाया है

मय-ख़ाना-ए-उल्फ़त के मय-ख़्वार को दुनिया ने
सूली पे चढ़ाया है और ज़हर पिलाया है

नादार का मौला है बहुतों से सुना है ये
फिर कौनसी ताक़त ने मुफ़्लिस को सताया है

तक़दीर के हाथों से तदबीर पिटी लेकिन
तक़दीर का सर अक्सर हिम्मत ने झुकाया है

इस राज़ को ऐ 'लाग़र' कोई भी नहीं समझा
क्या सोच के ख़ालिक़ ने दुनिया को बनाया है