उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHayal-o-fikr ke par mein uDan bandh ke chal

ख़याल-ओ-फ़िक्र के पर में उड़ान बाँध के चल

خیال و فکر کے پر میں اڑان باندھ کے چل

शायर: Qamar Siwani7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़याल-ओ-फ़िक्र के पर में उड़ान बाँध के चल
सुख़न के पाँव में तू आसमान बाँध के चल

ग़ज़ल की बज़्म में शिरकत जो करनी है तुझ को
इक एक शे'र में फ़न की ज़बान बाँध के चल

न जाने कब उसे तूफ़ाँ का सामना हो जाए
पुरानी नाव में तू बादबान बाँध के चल

सुलगती धूप में वो सर के काम आएगा
सफ़र में हौसले का साएबान बाँध के चल

ग़रीब-ए-शहर की बस्ती में तुझ को चलना है
रग-ए-ख़ुदी में सख़ावत की शान बाँध के चल

सभी ये पूछेंगे पत्थर ने क्या दिया है तुझे
जबीं पे ज़ख़्म का गहरा निशान बाँध के चल

ग़ज़ल की बज़्म में इक साज़ भी ज़रूरी है
'क़मर' ज़बान में नग़्मों की तान बाँध के चल