उर्दू शायरी · ग़ज़ल

chand jab meri chhat pe aata hai

चाँद जब मेरी छत पे आता है

چاند جب میری چھت پہ آتا ہے

शायर: Qamar Siwani9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

चाँद जब मेरी छत पे आता है
हर दिए को गले लगाता है

जौर-ओ-ज़ुल्म-ओ-सितम की ज़ुल्मत में
सब्र का जुगनू जगमगाता है

ग़म के सूरज की तेज़ किरनों से
दिल का तालाब सूख जाता है

नींद उड़ जाती है सियासत की
जब क़लम इंक़लाब लाता है

क्या क़रीब आ गई मिरी मंज़िल
क्यों क़दम मेरा डगमगाता है

वो मिरा अक्स-ए-ए'तिबार है जो
तेरी आँखों में झिलमिलाता है

कौन हर रोज़ दर्द का गुल-दान
अश्क के फूलों से सजाता है

किस ने टूटे दिलों को जोड़ दिया
शहर में किस को फ़न ये आता है

अपने दरबार में 'क़मर' बादल
रोज़ दरिया को क्यों बुलाता है