उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHayal hai na tasawwur mushahida hai na KHwab

ख़याल है न तसव्वुर मुशाहिदा है न ख़्वाब

خیال ہے نہ تصور مشاہدہ ہے نہ خواب

शायर: Zaheen Shah Taji8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

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ख़याल है न तसव्वुर मुशाहिदा है न ख़्वाब
तरह तरह से उठाता हूँ अपने रुख़ से नक़ाब

उठी निगाह तो हर सम्त से उठे पर्दे
नज़र हिजाब में है तो जमाल ज़ेर-ए-हिजाब

नए मक़ाम नई मंज़िलें नई राहें
क़दम क़दम पे जुनूँ के लिए नए आदाब

निगाह-ए-'इश्क़ हक़ीक़त है हुस्न-ए-'आलम की
मता’-ए-हुस्न बहुत जिन्स-ए-'आशिक़ी कम-याब

ज़बान है न बयाँ है मगर जुनूँ के लिए
तिरी अदाएँ तकल्लुम तिरी निगाह ख़िताब

मिरा वो पीर-ए-मुग़ाँ फ़ख़्र-ए-मय-कशाँ है वही
जो कर सके ग़म-ए-हस्ती को ग़र्क़-ए-जाम-ए-शराब

वो ख़ाम है जो तलब-गार-ए-जाम है साक़ी
तिरी नज़र है हमें तो मुसब्बिब-उल-अस्बाब

हम उन को देखने वाले हैं हम को देख 'ज़हीन'
कभी ये हम ने न देखा ये लुत्फ़ है कि 'इताब