उर्दू शायरी · ग़ज़ल

Khaali hath dikhane pahuncha ghar ghar main

ख़ाली हाथ दिखाने पहुँचा घर घर मैं

خالی ہاتھ دکھانے پہنچا گھر گھر میں

शायर: Balraj Hairat9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़ाली हाथ दिखाने पहुँचा घर घर मैं
शायद अगले वक़्तों का हूँ सिकंदर मैं

जब भी तेरी टोह में निकला बाहर मैं
ख़ुद को पीछे छोड़ गया हूँ अक्सर मैं

किस का चेहरा झाँक के देखूँ अंदर मैं
ख़ुद ही बुत हूँ ख़ुद ही अपना बुत-गर मैं

कितना ख़ुश हूँ तेरा लम्स चुरा कर मैं
शीशा-ख़ू सीमाब-तबी'अत पत्थर मैं

क्या दुनिया में कोई नहीं कहने वाला
ऐसी बात भरोसा कर लूँ जिस पर मैं

इस 'आलम को अहल-ए-नज़र क्या कहते हैं
चाहता कुछ हूँ करता कुछ हूँ अक्सर मैं

अब्र बना हूँ प्यास बुझाने धरती की
क़तरे क़तरे का मम्नून समुंदर मैं

लोगों ने क्या क्या न क़यास-आराई की
चुप था आज तिरे आगे से गुज़र कर मैं

'हैरत' किस ज़ंजीर के टूटे हल्क़े हैं
'अर्श पे तन्हा चाँद अकेला छत पर मैं