उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHaksari se yahan tak martaba uncha hua

ख़ाकसारी से यहाँ तक मर्तबा ऊँचा हुआ

خاکساری سے یہاں تک مرتبہ اونچا ہوا

शायर: Chandar Bhan Kaifi Dehelvi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़ाकसारी से यहाँ तक मर्तबा ऊँचा हुआ
दीदा-ए-गर्दूं की पुतली ख़ाक आग का पुतला हुआ

हूँ तिलिस्म-ए-रंग-ओ-बू के फेर में भूला हुआ
आदमी बंदा बशर है क्या करूँ धोका हुआ

इक पियाला था ख़राबात-ए-अज़ल का आसमाँ
वो भी अपनी गर्दिश-ए-क़िस्मत से है उल्टा हुआ

ये ख़मोशी है गुज़रगाह-ए-जहाँ में अल-अमाँ
कोई कुछ कहता नहीं आता हुआ जाता हुआ

'आलम-ए-नैरंग की रंगीनियाँ हैं दिल-फ़रेब
और भी वो रंग लाया रंग जो फीका हुआ

मौज-ए-रहमत हौज़-ए-कौसर के किनारे ले गई
मय-कशों का गुलशन-ए-फ़िरदौस में मेला हुआ

आतिश-ए-ख़ामोश के मानिंद था पहलू में दिल
उन के दामन की हवा लगते ही अंगारा हुआ

मस्त आँखें देख कर 'कैफ़ी' की मत जाती रही
कौन मयख़ाने में उस से बढ़ के मतवाला हुआ