उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kaun kahta hai ki mahrumi ka shikwa na karo

कौन कहता है कि महरूमी का शिकवा न करो

کون کہتا ہے کہ محرومی کا شکوہ نہ کرو

शायर: Hafeez Merathi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कौन कहता है कि महरूमी का शिकवा न करो
हाँ मगर साक़ी-ए-मय-ख़ाना को रुस्वा न करो

ज़िक्र छिड़ जाए अगर क़ौम की बद-बख़्ती का
रहनुमाओं की तरफ़ कोई इशारा न करो

ज़ेहन संजीदा मसाइल से हटाने के लिए
रोज़ ये शैख़ ओ बरहमन का तमाशा न करो

एक भी लफ़्ज़ हटाने की नहीं गुंजाइश
मेरे पैग़ाम-ए-मोहब्बत का ख़ुलासा न करो

ये त'अल्लुक़ की ख़राशें भी मज़ा देती हैं
रूठ जाए कोई तुम से तो मनाया न करो

आज भी मैं नहीं इंसान से मायूस कि जब
लोग कहते हैं ख़ुदा पर भी भरोसा न करो