उर्दू शायरी · ग़ज़ल

karishma kya na hua baat kaun si na hui

करिश्मा क्या न हुआ बात कौन सी न हुई

کرشمہ کیا نہ ہوا بات کون سی نہ ہوئی

शायर: Balraj Hairat7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

करिश्मा क्या न हुआ बात कौन सी न हुई
मगर चराग़ तले रौशनी कभी न हुई

कोई भी चूल तो सीधी नहीं मिली उस की
तिरा मिज़ाज हुआ बीसवीं सदी न हुई

वो प्यास थी कि हम अपना लहू भी पी जाते
ये इत्तिफ़ाक़ था उस सम्त फ़िक्र ही न हुई

जो काम हाथ में हम ने लिया सिरे न चढ़ा
जो बात सोच के तुम हँस दिए कभी न हुई

सलाम-ए-शौक़ हर इक रात की ज़बान पे था
शरीक-ए-हाल मगर कोई रात भी न हुई

निगल गया उसे मेरा मिज़ाज-ए-तीरा-शबी
वो चाँद ही था मगर उस से चाँदनी न हुई

उस आख़िरी तग-ओ-दौ का भी हश्र देख लिया
ख़ुशी से मिल के भी 'हैरत' कोई ख़ुशी न हुई