उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kami aane na pae ai falak kuchh jaur-e-paiham mein

कमी आने न पाए ऐ फ़लक कुछ जौर-ए-पैहम में

کمی آنے نہ پائے اے فلک کچھ جور پیہم میں

शायर: Pandit Vidya Ratan Aasi9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कमी आने न पाए ऐ फ़लक कुछ जौर-ए-पैहम में
बहुत है ताक़त-ए-बर्दाश्त-ए-ग़म आज भी हम में

कमी आई है जब से तेरे मेरे रब्त-ए-बाहम में
भटक कर रह गई है ज़िंदगी तारीकी-ए-ग़म में

हुई हैं अंजुमन में जब भी उस काफ़िर से चार आँखें
कही है दास्तान-ए-ग़म ज़बान-ए-चश्म-ए-पुर-नम में

उठा ही चाहता है अब जनाज़ा आरज़ूओं का
बुझा ही चाहती है शाम-ए-हस्ती अब कोई दम में

यही ले दे के अब तो रह गया है अपना सरमाया
जो आँसू देखते हैं आप मेरी चश्म-ए-पुर-नम में

न वो मेरे न दिल मेरा न अदना सी ख़ुशी मेरी
ये मेरा हौसला है जी रहा हूँ ऐसे आलम में

अगर ऐ आसमाँ आह-ओ-फ़ुग़ाँ पे हम उतर आएँ
बदल जाएगी तेरी सारी दुनिया बज़्म-ए-मातम में

कहीं नाम-ओ-निशाँ तक मिल न पाएगा मसर्रत का
कहाँ तक साथ मेरे दे सकेंगे जादा-ए-ग़म में

हयात-ए-मुख़्तसर की क्या कहें रूदाद हम तुझ से
ख़ुलासा ये कि गुज़री है परेशानी के आलम में