उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kahin pe sang kahin Khaar ban gae hote

कहीं पे संग कहीं ख़ार बन गए होते

کہیں پہ سنگ کہیں خار بن گئے ہوتے

शायर: Usama Asar5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कहीं पे संग कहीं ख़ार बन गए होते
वो जा रहा था तो दीवार बन गए होते

तुम्हारी तरह अगर जम' माल-ओ-ज़र करते
तो इक क़बीले के सरदार बन गए होते

वो इक निगाह-ए-करम इस तरफ़ अगर करते
ये जितने दश्त हैं गुलज़ार बन गए होते

किसी के साथ तो रिश्ता निबाह का होता
किसी के दिल के तो आज़ार बन गए होते

हम इतने दर्द-ओ-अलम झेलने के बा'द 'असर'
किसी के लब पे तो इक़रार बन गए होते