उर्दू शायरी · ग़ज़ल

is tarah mir ka diwan mujhe khinchta hai

इस तरह मीर का दीवान मुझे खींचता है

اس طرح میر کا دیوان مجھے کھینچتا ہے

शायर: Usama Asar7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इस तरह मीर का दीवान मुझे खींचता है
गो कोई साहिब-ए-'इरफ़ान मुझे खींचता है

जिस तरफ़ कुछ भी नहीं मिलता ब-जुज़ रुस्वाई
उस तरफ़ क्यों दिल-ए-नादान मुझे खींचता है

रोज़ ख़्वाबों में किसी साहिल-ए-दरिया की तरफ़
एक भूला हुआ अरमान मुझे खींचता है

दफ़'अतन दिल से तिरी याद लिपट जाती है
और इक गोशा-ए-वीरान मुझे खींचता है

अब तो ये हाल है थक कर मैं कहीं छाओं में
बैठ जाता हूँ तो सामान मुझे खींचता है

कुछ भी मा'लूम नहीं इस के सिवा अब मुझ को
सिर्फ़ इक जादा-ए-अंजान मुझे खींचता है

चलता है मौत का साया भी मिरे साथ 'असर'
और बचने का भी इम्कान मुझे खींचता है