उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kahin na phir koi dar-o-rasan se saz kare

कहीं न फिर कोई दार-ओ-रसन से साज़ करे

کہیں نہ پھر کوئی دار و رسن سے ساز کرے

शायर: Vahshi Kanpuri6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कहीं न फिर कोई दार-ओ-रसन से साज़ करे
ख़ुदा किसी को न आब आश्ना-ए-राज़ करे

कहाँ तक आदमी हील-ए-ख़िरद से साज़ करे
फ़ज़ा-ए-दहर को अल्लह जुनूँ-नवाज़ करे

न पूछ मर्तबा उस के मक़ाम-ए-आली का
जिसे वो फ़िक्र-ए-दो-आलम से बे-नियाज़ करे

हक़ीक़तों की तजल्ली भी पाएगा उस में
जो रू-ब-रू कोई आईना-ए-मजाज़ करे

नहीं है पुख़्ता अभी ज़ौक़-ए-बंदगी उस का
हुदूद-ए-दैर-ओ-हरम में जो इम्तियाज़ करे

हर एक साँस में सुनता है नग़्मा-ए-लाहूत
वो जिस को गोश-बर-आवाज़-ए-नै-नवाज़ करे