उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kahin chandan mahakta hai kahin kesar mahakta hai

कहीं चंदन महकता है कहीं केसर महकता है

کہیں چندن مہکتا ہے کہیں کیسر مہکتا ہے

शायर: Chandra Shekhar Varma7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कहीं चंदन महकता है कहीं केसर महकता है
ये ख़ुशबू है बुज़ुर्गों की जो मेरा घर महकता है

वो अपनी झुर्रियों वाली हथेली में दुआ भर कर
जो छू देते हैं मेरा सर तो मेरा सर महकता है

अगरबत्ती के जैसा हो गया है दिल हमारा अब
वो अपने देवता के सामने जल कर महकता है

तुम्हारे शहर में अब तो बहारें भी हुई बासी
हमारे गाँव आ जाओ यहाँ पतझड़ महकता है

मिरे इस जिस्म की अपनी कोई ख़ुशबू नहीं लेकिन
महकता हूँ मैं इस कारन मिरा दिलबर महकता है

सड़क पर ठोकरें दुनिया की वो खाता रहा बरसों
उसे मंदिर में जब रक्खा वही पत्थर महकता है

तिरा भीगा बदन इक दिन नज़र से छू लिया मैं ने
उसी दिन से मिरी आँखों का हर मंज़र महकता है