उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kahin bhi aap ka rahat koi maqam nahin

कहीं भी आप का 'राहत' कोई मक़ाम नहीं

کہیں بھی آپ کا راحتؔ کوئی مقام نہیں

शायर: Om Krishn Rahat9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कहीं भी आप का 'राहत' कोई मक़ाम नहीं
गुनाहगारों की फ़िहरिस्त में भी नाम नहीं

किसी की याद ही आने से अब झिझकती है
हमारे ज़ेहन में पहली सी धूम-धाम नहीं

हमारी रूह पिघलती है शेर कहने में
ये काम लोग समझते हैं कोई काम नहीं

कहाँ से रौशनी आएगी ख़ाना-ए-दिल में
कि शाम ढलने लगी है तुलू-ए-जाम नहीं

ये किस के शेर नसीम-ए-सहर सुनाती है
मिरा कलाम नहीं आप का कलाम नहीं

हम उस के फ़ैज़ से जन्नत-मकीं तो हैं लेकिन
उधर किसी से हमारी दुआ-सलाम नहीं

मिरी तलाश नई मंज़िलें दिखाती है
ठहर गया हूँ जहाँ वो मिरा मक़ाम नहीं

ख़राब-हाली-ए-गुलशन से क्यों परेशान हूँ
हमारे हाथ में गुलशन का इंतिज़ाम नहीं

उभर भी सकता हूँ 'राहत' मैं वर्ता-ए-ग़म से
बशर के बस का न हो ऐसा कोई काम नहीं