उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kabhi taskin kabhi aazar bhi hai

कभी तस्कीं कभी आज़ार भी है

کبھی تسکیں کبھی آزار بھی ہے

शायर: Pandit Vidya Ratan Aasi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कभी तस्कीं कभी आज़ार भी है
मोहब्बत फूल भी है ख़ार भी है

पिघल जाती है मिस्ल-ए-शम्अ' लेकिन
मोहब्बत आहनी दीवार भी है

तिरे होंटों पे है इंकार लेकिन
तिरी आँखों में कुछ इक़रार भी है

ब-ज़ाहिर हैं सभी ग़म-ख़्वार लेकिन
हक़ीक़त में कोई ग़म-ख़्वार भी है

कभी उन की नज़र है वजह-ए-तस्कीं
कभी चलती हुई तलवार भी है

न जा इस पर कि मैं चुप हूँ सितम पर
ये ख़ामोशी लब-ए-गुफ़्तार भी है

ज़माना तंज़-फ़रमा भी है लेकिन
उलझना इश्क़ से बे-कार भी है

फ़क़त गुफ़्तार पर नाज़ाँ है 'आसी'
ख़याल-ए-ख़ूबी-ए-किरदार भी है