उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kabhi ranj-o-gham to kabhi be-kasi hai

कभी रंज-ओ-ग़म तो कभी बे-कसी है

کبھی رنج و غم تو کبھی بے کسی ہے

शायर: Pandit Vidya Ratan Aasi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कभी रंज-ओ-ग़म तो कभी बे-कसी है
मिरी ज़िंदगी भी अजब ज़िंदगी है

गिला क्या करूँ उन के ज़ोर-ओ-सितम का
हमेशा से उन की ये आदत रही है

मोहब्बत में जीना मोहब्बत में मरना
मिरी ज़िंदगी का अक़ीदा यही है

हुआ क्या है आख़िर हमें भी पता हो
भला हम से क्यों आज ये बे-रुख़ी हो

अगरचे ग़म-ए-दहर का सामना है
मगर मेरे होंटों पे फिर भी हँसी है

बयाँ क्या करूँ कैफ़ियत दिल की 'आसी'
मोहब्बत में अब जान पर आ बनी है