उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kabhi KHak mein lash Dhak jaegi

कभी ख़ाक में लाश ढक जाएगी

کبھی خاک میں لاش ڈھک جائے گی

शायर: Ghayur Jafari6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कभी ख़ाक में लाश ढक जाएगी
अंधेरे में हड्डी चमक जाएगी

मिरा हश्र ये है कि इक छिपकली
मिरे ज़ेहन से ही चिपक जाएगी

कोई राह पाए न पाए मगर
हवा पानियों को थपक जाएगी

न वो मुझ से इतना क़रीब आएगा
न मेरी सदा दूर तक जाएगी

क़दम जितना आगे है पीछे भी है
ख़ुद अपने ही अंदर सड़क जाएगी

ख़ुदा बन गई है गडरिए की सोच
कोई भेड़ कैसे भटक जाएगी