उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kabhi ishq se kabhi pyar se

कभी 'इश्क़ से कभी प्यार से

کبھی عشق سے کبھی پیار سے

शायर: Maaham Shah6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कभी 'इश्क़ से कभी प्यार से
कभी मौसमों की बहार से

शब-ए-हिज्र रौशनी हो गई
मिरे आँसुओं की क़तार से

न बहल सकी न निकल सकी
तिरे दिल के एक भी तार से

न ही तेरे दिल में ठहर सकी
कभी इज़्तिराब-ओ-क़रार से

मैं निकल के अब कहाँ जाऊँगी
तिरी चाहतों के हिसार से

ये जो चश्म-ए-'माहम' उबल पड़ी
तिरे ख़्वाब ही के ख़ुमार से