उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dil ke zaKHmon ka kuchh kya na karo

दिल के ज़ख़्मों का कुछ क्या न करो

دل کے زخموں کا کچھ کیا نہ کرو

शायर: Maaham Shah6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दिल के ज़ख़्मों का कुछ क्या न करो
चाक हो जाए तो सिया न करो

ख़्वाब होते हैं देखने के लिए
उन में जा के सनम जिया न करो

जिसे तुम छोड़ आए हो वो शहर
उसे अब याद तुम किया न करो

राह में छोड़ कर चला जो गया
नाम उस शख़्स का लिया न करो

बड़े आदाब हैं मुशाएरे के
कभी वक़्त-ए-सुख़न पिया न करो

इतना कम-ज़र्फ़ वो नहीं 'माहम'
उसे तुम मशवरे दिया ना करो