उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kabhi hota hai pareshan kabhi sharmata hai

कभी होता है परेशाँ कभी शरमाता है

کبھی ہوتا ہے پریشاں کبھی شرماتا ہے

शायर: Osama Khalid7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कभी होता है परेशाँ कभी शरमाता है
आईना मेरे ख़द-ओ-ख़ाल से घबराता है

रेंगते रेंगते इक आह मुझे खींचती है
और इक ख़ौफ़ मिरे जिस्म में दर आता है

ख़ुद भी मैं ख़ाक-ज़दा ख़स्ता बदन हूँ प मुझे
अपने कश्कोल की हालत पे तरस आता है

यक-ब-यक एक चराग़ अपनी तरफ़ खींचता हूँ
अज़दहा देखता है और लिपट जाता है

कितना मानूस है मुझ से तिरे होंटों का सुकूत
मुस्कुराऊँ तो मिरे हल्क़ तक आ जाता है

रफ़्ता रफ़्ता मुझे झिंझोड़ता है सब्ज़-ए-ख़ुदा
जैसे दीमक कोई लकड़ी की ग़िज़ा खाता है

शाम के वक़्त लहू रंग-ए-मोहब्बत की तरह
कोई आता है रुलाता है चला जाता है