उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kabhi aawaz de ek bar koi

कभी आवाज़ दे इक बार कोई

کبھی آواز دے اک بار کوئی

शायर: Fahmi Badayuni7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कभी आवाज़ दे इक बार कोई
अगर मौजूद है उस पार कोई

सुकूँ से दिन गुज़रता है हमारा
मंगाते ही नहीं अख़बार कोई

यहाँ दैर-ओ-हरम बनने से पहले
नहीं थी आहनी दीवार कोई

हज़ारों काम हैं दश्त-ए-जुनूँ में
यहाँ फिरता नहीं बेकार कोई

अब ऐसे जुर्म भी होने लगे हैं
नहीं है जिन का ज़िम्मेदार कोई

हम अपना अजनबी-पन भूल जाएँ
अगर पहचान ले इक बार कोई

सुना है कल तिरे कूचे में हम ने
कतर दी हाथ से तलवार कोई