उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kab tak us ka hijr manata sahra chhoD diya

कब तक उस का हिज्र मनाता सहरा छोड़ दिया

کب تک اس کا ہجر مناتا صحرا چھوڑ دیا

शायर: Obaid Siddiqi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कब तक उस का हिज्र मनाता सहरा छोड़ दिया
जीने की उम्मीद में मैं ने क्या क्या छोड़ दिया

मेरे साथ लगा रहता है यादों का बादल
धूप-भरे रस्तों पर उस ने साया छोड़ दिया

हर चेहरे पर इक चेहरे का धोका होता है
किस ने मुझ को इस बस्ती में तन्हा छोड़ दिया

दुनिया सब कुछ जान गई है मेरे बारे में
बिंत-ए-अलम ने ना-महरम से पर्दा छोड़ दिया

पहले पहले ख़ौफ़ बहुत आता था मरने से
फिर वो मंज़िल आई मैं ने डरना छोड़ दिया