उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kab khulega ki falak par se aage kya hai

कब खुलेगा कि फ़लक पार से आगे क्या है

کب کھلے گا کہ فلک پار سے آگے کیا ہے

शायर: Tabish Kamal5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कब खुलेगा कि फ़लक पार से आगे क्या है
किस को मालूम कि दीवार से आगे क्या है

एक तुर्रा सा तो मैं देख रहा हूँ लेकिन
कोई बतलाए कि दस्तार से आगे क्या है

ज़ुल्म ये है कि यहाँ बिकता है यूसुफ़ बे-दाम
और नहीं जानता बाज़ार से आगे क्या है

सर में सौदा है कि इक बार तो देखूँ जा कर
सर-ए-मैदान सजी दार से आगे क्या है

जिस ने इंसाँ से मोहब्बत ही नहीं की 'ताबिश'
उस को क्या इल्म कि पिंदार से आगे क्या है