उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kab diya ye jala hawa ke liye

कब दिया ये जला हवा के लिए

کب دیا یہ جلا ہوا کے لیے

शायर: SabeenSaif10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कब दिया ये जला हवा के लिए
'इश्क़ होता नहीं फ़ना के लिए

याद मुझ को न आ ख़ुदा की तरह
अब मुझे बख़्श दे ख़ुदा के लिए

आज देखा शहाब-ए-साक़िब तो
हाथ फैला दिए दु'आ के लिए

मैं ने पूछा कि ज़िंदगी क्यों है
हँस के बोला तिरी सज़ा के लिए

एक लम्हे को जो अमाँ दे दे
कितना तरसे हैं उस रिदा के लिए

दिल से कोई सदा नहीं उभरी
जब से बिछड़ा है वो सदा के लिए

मार देती है जान से हम को
फिर भी मरते हैं हम अना के लिए

अपने ख़ूँ से दिया जलाया है
मैं ने इस सर-फिरी हवा के लिए

रूह को भी असीर कर डाला
हम ने सय्याद की रज़ा के लिए

कौन उन को मिटा सका है 'सबीन'
मिट गए हैं जो कर्बला के लिए